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Saturday, December 5, 2015

जाती और संविधान लेखक: डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऑनलाईन पढ़ें व डाऊनलोड करें


जाती और
संविधान
लेखक: डॉ. भीमराव अम्बेडकर
अनुवादक: निखिल सबलानिया
                                      


लेखक: डॉ. भीमराव अम्बेडकर
      अनुवादक: निखिल सबलानिया




प्रथम संस्करण 2015

निखिल सबलानिया प्रकाशन
नई दिल्ली
मोबाईल: 8527533051 ईमेल: sablanian@gmail.com

सर्वाधिकार सुरक्षित ©निखिल सबलानिया
अनुवादक की अनुमति के बिना
इस हिंदी लेख का किसी भी प्रकार
से पुनर्निर्माण करना वर्जित है


स्रोत: MR. GANDHI AND THE EMANCIPATION OF THE UNTOUCHABLES

Chapter IX : Caste and Constitution

यह प्रश्न न्याय सांगत (न्यायोचित) है कि अछूतों की मांगों को संविधान में क्यों शामिल किया जाए? विश्व में कहीं भी संविधान निर्माताओं के समक्ष यह विवशता नहीं थी कि वे ऐसे मुद्दों को देखे। मैं मानता हूँ कि यह एक जरुरी प्रश्न है और जो इस प्रश्न को उठा रहे हैं या इस बात पर दबाव दे रहे हैं कि इसका संवैधानिक महत्त्व है, इसके उत्तर की उनसे ही अपेक्षा है। मेरी दृष्टी में इसका उत्तर स्वाभाविक है। भारत की सामाजिक व्यवस्था से ही यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि इसका संवैधानिक महत्त्व है। यह केवल हिन्दुओं की जाती-व्यवस्था और धार्मिक-व्यवस्था ही है जो कि इसके लिए उत्तरदायी हैं। यह संक्षिप्त वक्तवय, विदेशियों के समक्ष हिन्दू जाती-व्यवस्था और धार्मिक व्यवस्था के सामाजिक और राजनीतिक दुष्प्रभाव (बुरे प्रभाव) की यथोचित (जैसी-की-तैसी) व्याख्या के लिए पर्याप्त नहीं है। पर यह भी उतना ही सच है, कि इस लेख की समिति परिधि में, जाती-व्यवस्था के संविधान पर क्या दुष्प्रभाव होंगे, यह विस्तृत रूप से समझना असंभव है। मैं अपनी पुस्तक 'एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट' (जाती का सर्वनाश) में इस विषय का पूर्ण खुलासा करूँगा, जिसे मैंने कुछ समय पहले लिखा है। मेरा मानना है कि यह (पुस्तक) हिन्दुओं की जाती और धार्मिक व्यवस्था के समाजिक और आर्थिक परिणाम पर काफी प्रकाश डालेगी। इस लेख में मैं प्रमुख विचारों को ही प्रस्तुत करूंगा।

संविधान को तैयार करने में सामाजिक संरचना का सदैव ध्यान रखना होता है। राजनीतिक संरचना सामाजिक संरचना से संबंधित होनी चाहिए। सामाजिक शक्तियों का संचालन केवल सामाजिक क्षेत्र तक ही सिमित नहीं रहता। वह राजनीती के क्षेत्र में भी घुस जाते हैं। अछूतों (*अनुसूचित जाती का वर्ग, वे जो गाय खाते थे और कई आधारों में से एक गाय खाने के आधार पर उन्हें 1910 में पहली बार तैयार की गई जनसंख्या की सूचि में अछूतों की श्रेणी में श्रेणीबद्ध किया गया) का यह दृष्टिकोण है और मुझे विशवास है कि यह निर्विवाद है। हिन्दू इस तर्क और इसकी शक्ति से पूरी तरह सचेत हैं। पर वे (हिन्दू) क्या करते हैं, कि वे इससे इंकार करते हैं कि हिन्दू समाज की संरचना (बनावट) किसी भी रूप में यूरोपियन समाज की संरचना से भिन्न (अलग) है। वह इस विवाद से निपटने के लिए यह कहते हैं कि हिन्दुओं की 'जाती-व्यवस्था' और पश्चिमी समाज की 'वर्ग-व्यवस्था' के बीच कोई भेद नहीं है। यह पूर्ण रूप से आभास कर सकने वाला झूठ है और जाती-व्यवस्था व वर्ग-व्यवस्था की पूर्ण अज्ञानता का खुलासा करता है। जाती-व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था है जो कि अलग-थलग (एकाकी, सबसे अलग) की भावना से संक्रमित है और वास्तव में इसकी (जाती-व्यवस्था का) यह (किसी गुण के सामान) विशेषता है कि यह एक जाती को दूसरी जाती से अलग-थलग करती है। वर्ग-व्यवस्था में भी एकाकीपन है पर वह न तो एकाकीपन को विशेषता बनाता है और न ही सामाजिक संसर्ग (समाज से समाज का जुड़ना, मेल-जोल) को प्रतिबंधित करता है (*यूरोपियन समाज में गुलाम भी राजा बने पर हिन्दू समाज में जाती में किया जा सकनेवाला काम ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी किया जा सकता था)। यह सच है कि वर्ग-व्यवस्था ने समूहों को उत्पन्न किया है। पर वह (समूह) जाती समूहों के समरूपी (समान रूप वाले) नहीं हैं। वर्ग-व्यवस्था के समूह मात्र गैर-सामाजिक (समाज को विभाजित करने वाला) हैं जबकि जाती-व्यवस्था में जातियां अपने परस्पर सम्बन्ध में निश्चित और स्पष्ट रूप से असामाजिक (समजा का बुरा करने वाली) हैं।

यदि वह विश्लेषण सही है तो इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हिन्दू समाज की सामाजिक संरचना (यूरोपियन वर्ग-व्यवस्था की सामाजिक संरचना से) भिन्न है और इसके परिणाम स्वरूप इसकी (हिन्दू समाज की) राजनितिक संरचना (बनावट) को भी भिन्न होना चाहिए (*अर्थात भारतीय संविधान की बनावट यूरोपियन व अन्य देशों के संविधानों से इसलिए भिन्न होनी चाहिए क्योंकि भारत में हिन्दू धर्म की जाती-व्यवस्था और यूरोप की वर्ग-व्यवस्था में भिन्नता है, और जाती का एकाकीपन इस भिन्नता की एक प्रमुख विशेषता है)। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो अछूत यही चाह रहे हैं कि (लक्ष्यों को प्राप्त करने वाले) माध्यम (साधन) और लक्ष्यों के बीच उचित सम्बन्ध होना चाइए। लक्षय एक ही है। पर चूँकि लक्षय सामान ही है, पर इसका यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि लक्षय को प्राप्त करनेवाले साधन भी सामान ही हो। वास्तव में, लक्षय सामान ही रह सकते हैं और फिर भी (उनको प्राप्त करने के) माध्यम समय और स्थिति के हिसाब से भिन्न हो सकते हैं। जो अपने लक्ष्यों को पाने के लिए सजग (सचेत) हैं, यदि उनकी यह इच्छा है कि उनके दिमागों में जो लक्षय हैं वह शिथिल (निर्जीव, हतोत्साहित, बिना दम वाला) न पड़ जाए, तो उन्हें इस तथ्य को जरूर स्वीकारना चाहिए और (लक्षय प्राप्ति के) दूसरे माध्यमों को अपनाने के लिए स्वीकार कर लेना (मान लेना) चाहिए।

मैं इस सम्बन्ध में एक और बात का उल्लेख करना चाहूंगा। जैसा कि मैंने कहा कि, जाती हिन्दू समाज का ऐसा आधार है जिसकी वजह से यह आवश्यक है कि राजनीतिक संरचना को भिन्न होना चाहिए और वह सामाजिक संरचना के अनुकूल हो। बहुत से लोग इसे स्वीकार करते हैं परन्तु तर्क देते हैं कि हिन्दू समाज में जातियां समाप्त की जा सकती है। मैं इस बात को नकारता हूँ। जो इस बात की वकालत करते हैं वह सोचते हैं कि जाती कोई ऐसी संस्था है जैसे क्लब, नगर-पालिका या काउंटी काउन्सिल। यह पूर्णतः एक गलती है। 'जाती' है 'धर्म' और धर्म एक संस्था के सिवाय और कुछ नहीं।  इसे (जाती) को (संस्था - धर्म) में प्रतिपादित (संस्थागत) किया जा सकता है पर यह (जाती) उस संस्था के सामान नहीं बन पाएगा जिसमे इसे रोपा गया है (*अर्थात जाती ही धर्म है, अर्थात हिन्दू धर्म का अर्थ ही है जात-पात)। धर्म प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में क्रमशः (धीरे-धीरे) विस्तृत होने वाली एक शक्ति या प्रभाव है जो कि उसकी पसंद और नापसंद, उसके कार्यों और प्रतिक्रियाओं को निर्धारित करता, उसके चरित्र को अकार देता है। यह पसंद और नापसंद, कार्य और प्रतिक्रियाएं ऐसे संस्था नहीं हैं जिन्हें काट (कर अलग कर) दिया जाए। यह वे शक्तियां और प्रभाव हैं जिनसे निपटने के लिए यह जरुरी है कि इन्हें नियंत्रित और रोकथाम की जाए (*अर्थात हिन्दू धर्म की जातपात की रोकथाम उन लोगों को राजनितिक अधिकार दे कर ही प्राप्त जी जा सकती है जो इस पक्षपात के शिकार हैं)। यदि सामाजिक शक्तियों को राजनीती को विषाक्त करने से रोकना है, और (सामाजिक शक्तियों को) इन्हें कुछ लोगों की शक्तिवाहिनी (शक्ति प्रदान करने वाली) और बहुत से लोगों के पतन करने से रोकना है, तो इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि राजनितिक संरचना इस प्रकार बनाई जाए जिससे कि इसमें ऐसी व्यवस्था करने का क्रिया-तंत्र हो जिससे कि पक्षपात (पूर्वाग्रहों) को बंद किया जाए और उस अन्याय को निष्क्रिय किया जाए को उन सामाजिक शक्तियों को खुल्ला छोड़ दिए जाने पर होता है।

अब तक मैंने सामान्य रूप से यह स्पष्ट किया है कि एक विशिष्ट सामाजिक संरचना वाले हिन्दू समाज के लिए, एक विशिष्ट राजनैतिक संरचना (बनावट) की क्यों आवश्यकता है और भारत के संविधान को बनाने वाले इन समस्याओं की अनदेखी क्यों नहीं कर सकते, जैसी समस्याएं अन्य देशों के संविधान निर्माताओं को परेशान नहीं करती। अब मैं विशिष्ट प्रश्न पर आता हूँ, कि भारतीय संविधान में साम्प्रदायिक योजना (*समुदायों के हिसाब से अधिकार देने की योजना) को स्थान देना क्यों आवशयक है, और अछूतों के लिए सरकारी सेवाओं में स्थान क्यों उल्लेखित (*विशेष रूप से लिखना या वर्णित किया) जाए और उनके निजी अधिकार के रूप में उन्हें सौपे जाएं। इन मांगों का औचित्य सहज और स्वाभाविक है। यह बात इस निर्विवाद तथ्य से उत्पन्न होती है कि हिन्दुओं से अछूतों को अलग करना, गैर-जरुरी मुद्दों की भिन्नता के कारण नहीं है। यह मूलभूत शत्रुता और बैर का मुद्दा है। इस शत्रुता और बैर के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। अस्पृश्यता की प्रणाली हिन्दुओं और अछूतों के बीच निहित (अन्तर्हित) शत्रुता के लिए पर्याप्त सबूत है। इस शत्रुता को देखते हुए अछूतों से यह कामना करना सहजतः असंभव है कि, हिन्दुओं की अंग्रेजों से स्वतंत्रता मिलने पर, अछूत उन (हिन्दुओं) पर इस बात पर आश्रित रहें और विशवास करें कि हिन्दू उनके साथ न्याय करेंगे। कौन कह सकता है कि अछूत यह कहने में सही नहीं हैं कि वह हिन्दू पर भरोसा  नहीं करते? अछूत के लिए हिन्दू उतना ही परदेसी है जितना की यूरोपियन है और सबसे बुरा यह है कि यूरोपवासी विदेशी होते हुए भी निष्पक्ष हैं जबकि हिन्दू अपने वर्ग के लिए बेशर्मी से पक्षपात करता है और अछूतों से शत्रुता रखता है। इसमें कोई संशय नहीं कि हिंदू ने इतने युगों से ऐसे बैर, तिरस्कार और अवहेलना की है जैसे वह किसी भिन्न और घृणा किए जानेवाले समाज के तबके से हो, जैसे किसी दूसरी ही प्रजाति से न हो। अपनी मान्यताओं के अनुरूप हिन्दू अपने को अतिविशिष्ट वर्ग मानता है वह अपने पूर्वाग्रहों के कारण अछूतों की आकांक्षाओं का कभी ध्यान नहीं रखता, उनसे वह कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहता और वह उनके हितों का विरोधी है। ऐसे लोगों पर अछूत अपना भाग्य कैसे छोड़ सकते हैं? अछूतों से यह पूछना कितना न्याय सांगत है कि वे अपना हित ऐसे लोगों के हाथों में छोड़ दे जो कि अपने उद्देश्यों और इच्छाओं में उनके (अछूतों के) विरोधी हैं, जिनकी अछूतों को शक्तिशाली प्रदान करनेवाली जैविक शक्तियों से सहानुभूति नहीं है, जिनमें उनकी चाहतों, मनोकामनाओं और इच्छाओं के लिए कोई जोश नहीं है, जिनमें उनकी आकांक्षाओं के प्रति (मिटा देने वाली) शत्रुता है, जो निश्चित ही उन्हें न्याय देने से इंकार कर देंगे, और उनसे भेदभाव करेंगे, और जो अपने धार्मिक प्रतिबंधों से अछूतों के प्रति निर्लज्जता (बेशर्मी से) से किसी भी प्रकार का अमानवीय व्यहवाहर करने से न रुके थे और न रुकेंगे (*इस कथन की सच्चाई आज वर्षों उपरांत भी ज्यों-की-त्यों है)। ऐसे लोगों से मात्र यही सुरक्षा है, जो कि अछूत हिन्दू बहुसंख्यकों की क्रूरता से उनको सुरक्षा प्रदान करवा सकता है, कि संविधान में उनके राजनीतिक अधिकारों को (*स्पष्ट रूप से) वर्णित किया जाए। क्या अछूतों की यह मांग गैर-जरुरी (अत्याधिक) है?

* अनुवादक की टिप्पणियाँ  

डॉ भीमराव अम्बेडकर के अनुयाईयों के लिए एक दुखद सूचना अधिक-से-अधिक शेयर (साझा) करें 
अब देखिए उदाहरण के साथ : नीचे जाएं 

प्रिय मित्रों जय भीम।

मैं निखिल सबलानिया, नई दिल्ली से आपको यह सूचित करता हूँ कि आप में से जो भी लोग डॉ. भीम राव अम्बेडकर के हिंदी व अन्य भाषाओं में प्रकाशित किए गए भारत सरकार के वांग्मय को पढ़ रहे हैं वें या तो इंग्लिश सीख कर उन्हें इंग्लिश में पढ़े, अथवा रूपये एकत्र करके उनका किसी विद्वान से सही अनुवाद किसी दूसरी भाषा में करवाएं। मैंने हिंदी भाषा में प्रकाशित भारत सरकार के वांग्मय को जब बाबा साहिब के अंग्रेजी के असली लेखों से चेक किया तो पाया कि डॉ. अम्बेडकर की असल लेखनी को इतना तोड़ मरोड़ दिया गया है कि एक तो वह समझ ही नहीं आती और दूसरी सबसे बुरी बात कि उसका उलटा ही अर्थ निकलता है। तो बाबा साहिब अपनी असल लेखनी मैं जैसा इंग्लिश में लिखते हैं, भारत सरकार द्वारा प्रकाशित हिंदी लेखनी में उसका उलटा ही है। और यह छेड़छाड़ उन प्रमुख स्थानों पर है जहां बाबा साहिब मुख्य बात लिखना चाहत (या बताना चाहते) हैं। प्रश्न यह उठता है कि क्या प्राइवेट प्रकाशकों की पुस्तकें सही हैं ? मैंने जो अपने अध्यन्न में पाया है, वह यह है कि प्राइवेट प्रकाशकों ने भी भारत सरकार के उसी वांग्मय को थोड़ा बदल कर प्रकाशित किया है। अर्थात उन्होंने भी सही प्रकार अनुवाद नहीं किया।

मैं आपसे यह बात कहना चाहता हूँ कि डॉ. अम्बेडकर की लेखनी इंग्लिश में ही पढ़ें। अथवा जैसे  मैंने ऊपर लिखा है, कि रूपये एकत्र करके उसका सही विद्वान से ही अनुवाद कराया जाए। कृपया इस बात को अधिक-से-अधिक लोगों तक फैलाएं, और उन्हें सतर्क कर दें कि वें डॉ. अम्बेडकर की लेखनी इंग्लिश में ही पढ़ें। मैं स्वयं भी डॉ. अम्बेडकर के कुछ लेखों का अनुवाद कर रहा हूँ और उन्हें धीरे-धीरे प्रकाशित करूंगा। समय की कमी होने के कारण मैं हिंदी वांग्मय की सहायता लूंगा परन्तु डॉ. अम्बेडकर की लिखी मुख्य बात को चेक करके, सही करके ही प्रकाशित करूंगा।

जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है कि यह सूचना दुखद है, क्योंकि हज़ारों लोग डॉ. अम्बेडकर के वांग्मय पढ़ते हैं, परन्तु यह वांग्मय इस प्रकार उन्हें वह सूचना देने की बजाए, जो कि डॉ. अम्बेडकर बताना चाहते थे, गलत और उलटी ही सूचना दी जा रही है। यह कितनी दुखद बात है। जैसा कि मैं कहता हूँ, कि सरकार के भरोसे नहीं रहना चाहिए, आज फिर मैं यही कहूँगा कि सरकार के भरोसे न रहें और अपना, सही प्रकाशन, अपने सही विद्वानों से ही करवाएं।

एक उदाहरण देखिए:

डॉ. भीमराव अम्बेडकर के एक भाषा में वांग्मय में इस प्रकार एक वाक्य लिखा है।

केवल हिन्दुओं की जाती प्रथा और सामाजिक व्यवस्था ही इसके लिए उत्तरदायी हैं। विदेशियों के समक्ष यथोचित व्याख्या के लिए हिन्दू समाज और धर्म व्यवस्था के फलितार्थ बताने के लिए यह संक्षिप्त वक्तवय पर्याप्त नहीं है। (गलत)

एक प्राइवेट प्रकाशक ने वांग्मय के वाक्य में केवल के स्थान पर "इसके लिए" लगा कर बाकी वाक्य को को वैसा का वैसा प्रकाशित कर दिया है:

इसके लिए हिन्दुओं की जाती प्रथा और सामाजिक व्यवस्था ही इसके लिए उत्तरदायी हैं। विदेशियों के समक्ष यथोचित व्याख्या के लिए हिन्दू समाज और धर्म व्यवस्था के फलितार्थ बताने के लिए यह संक्षिप्त वक्तवय पर्याप्त नहीं है। (गलत)

अब देखिए की डॉ. अम्बेडकर के असल इंग्लिश भाषण में क्या लिखा है।

It is the Caste system and the Religious system of the Hindus which is solely responsible for this. This short statement may not suffice to give an adequate explanation to foreigners of the social and political repercussions of the Hindu Caste and Religious systems.


अब देखिए की डॉ. अम्बेडकर के उपरोक्त वाक्य का सही अनुवाद क्या है और उस अनुवाद और वांग्मय और प्राइवेट प्रकाशक के अनुवाद में कितना और किस प्रकार का अंतर है :

It is the Caste system and the Religious system of the Hindus which is solely responsible for this.

मेरे द्वारा किया गया अनुवाद :

यह केवल हिन्दुओं की जाती प्रथा और धार्मिक व्यवस्था ही है जो कि इसके लिए उत्तरदायी हैं। (सही)   

वांग्मय और प्राइवेट प्रकाशक ने इंग्लिश के शब्दों  "Religious system" के स्थान पर "सामाजिक व्यवस्था" शब्द जोड़े हैं, जबकि शब्द हैं "धार्मिक व्यवस्था।" वांग्मय का अनुवाद करनेवालो ने किस प्रकार चतुराई से 'धर्म' की जगह 'समाज' शब्द का प्रयोग कर लिया और प्राइवेट प्रकाशक ने वांग्मय से जैसा का तैसा उठा कर प्रकाशित कर दिया और दोनों ने डॉ. अम्बेडकर  की बात को किस ढंग से गलत प्रकाशित कर दिया। 

अब दूसरा वाक्य देखिए :

This short statement may not suffice to give an adequate
explanation to foreigners of the social and political
repercussions of the Hindu Caste and eligious systems.

वांग्मय और प्राइवेट प्रकाशक का :
विदेशियों के समक्ष यथोचित व्याख्या के लिए हिन्दू समाज और धर्म व्यवस्था के फलितार्थ बताने के लिए यह संक्षिप्त वक्तवय पर्याप्त नहीं है।
मेरे द्वारा अनुवादित वाक्य :

यह संक्षिप्त वक्तवय, विदेशियों के समक्ष हिन्दू - जाती प्रथा और 
धार्मिक व्यवस्था के सामाजिक और राजनीतिक दुष्प्रभाव  (प्रतिघातबुरे प्रभाव) की यथोचित व्याख्या के लिए  पर्याप्त नहीं है। (सही)   

वांग्मय में और प्राइवेट प्रकाशक ने डॉ. अम्बेडकर के वाक्य में लिखित शब्दों Hindu Caste के लिए "हिन्दू समाज" शब्द का प्रयोग किया है जबकि उसका सही अनुवाद है "हिन्दू जाती प्रथा," जिससे कि बात का अर्थ ही बदल जाता है। डॉ. अम्बेडकर द्वारा लिखित शब्दों social and political (सामाजिक और राजनीतिकको तो वांग्मय और प्राइवेट प्रकाशक ने एकदम उड़ा ही दिया है, जिसे मैंने अपने अनुवाद में शामिल किया है (आप उसे बोल्ड शब्दों में देख सकते हैं। अब एक बार दूसरे वांग्मय और प्राइवेट प्रकाशक द्वारा अनुवादित दूसरे वाक्य के अनुवाद पर ध्यान दीजिए और फिर उसकी मेरे द्वारा अनुवादित वाक्य से तुलना कीजिए, तो आपके होश ही उड़ जाएंगे कि किस प्रकार महान विद्वान और लेखक डॉ. अम्बेडकर के वाक्य को बदल दिया गया है। देखिए कि कैसे उन्होंने क्या लिखा और उसको किस प्रकार अनुवादित करके प्रकाशित किया गया है। 

सबसे बुरी बात यह है की डॉ. अम्बेडकर ने प्रयोग किए शब्द repercussions के स्थान पर वांग्मय और प्राइवेट प्रकाशक के 'फलितार्थ' शब्द  लगाया है , जिसका अर्थ है फलतः (इसके स्वरूप) और यह वह अर्थ नहीं है जो कि डॉ. अम्बेडकर के लिखे गए शब्द का सही अर्थ है। डॉ. अम्बेडकर के शब्द का सही अर्थ है : "दुष्प्रभाव" (बुरा प्रभाव" या "प्रतिघात) 

अर्थात वांग्मय और प्राइवेट प्रकाशक ने डॉ. अम्बेडकर के शब्द को गलत ढंग से अनुवादित करके प्रकाशित किया है जिससे उसका वह अर्थ नहीं निकलता जो डॉ. अम्बेडकर की इंग्लिश वाली असल लेखनी में लिखा है। 

यह तो आपने एक उदाहरण देखा है, पर वांग्मय और उससे नक़ल करके प्राइवेट प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित किए गए डॉ. अम्बेडकर की पुस्तकों और लेखनी में किस प्रकार बाबा साहिब की असली लेखनी को बदला जा रहा है, यह सच में एक पीड़ादायक, दुखी बात है।

केवल हिन्दुओं की जाती प्रथा और सामाजिक व्यवस्था ही इसके लिए उत्तरदायी हैं। विदेशियों के समक्ष यथोचित व्याख्या के लिए हिन्दू समाज और धर्म व्यवस्था के फलितार्थ बताने के लिए यह संक्षिप्त वक्तवय पर्याप्त नहीं है। (गलत)

यह केवल हिन्दुओं की जाती प्रथा और धार्मिक व्यवस्था ही है जो कि इसके लिए उत्तरदायी हैं। यह संक्षिप्त वक्तवय, विदेशियों के
समक्ष हिन्दू - जाती प्रथा और धार्मिक व्यवस्था के सामाजिक
और राजनीतिक दुष्प्रभाव (बुरे प्रभाव) की यथोचित व्याख्या के लिए पर्याप्त नहीं है। (सही)  

इंग्लिश में डॉ. अम्बेडकर की समस्त लेखनी नीचे दिए लिंक से डाऊनलोड करें 

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